This blog is an imagination of my thoughts on love in marriage—how misunderstandings don’t distance a couple, but slowly build a deeper and stronger bond.
Dear Sister I have a gift of God for your supreme welfare, I guess you can read Hindi but if not then please do get it translated into English through Google:
क्या आप जानते हैं जितेन्द्रिय, नियमित, निरंतर जप-ध्यान करने वाला श्रद्धावान भक्त ही दिव्य ज्ञान प्राप्त करता है, कामी-क्रोधी-लोभी नहीं ?
जो श्रद्धावान है, इन्द्रियों को वश में रखता है, और साधना में तत्पर रहता है—वही दिव्य ज्ञान प्राप्त करता है। ऐसा ज्ञानी शीघ्र ही परम शांति को प्राप्त होता है।
व्याख्या:
इस श्लोक में भगवान स्पष्ट करते हैं कि केवल बाहरी पूजा या ज्ञान की चर्चा से आत्मबोध नहीं होता।
ज्ञान प्राप्ति के लिए तीन गुण अनिवार्य हैं:
- श्रद्धा: गुरु, शास्त्र और ईश्वर में अडिग विश्वास।
- संयम: इन्द्रियों पर नियंत्रण, ताकि मन विषयों में न भटके।
- तत्परता: निरंतर अभ्यास, जप, ध्यान और आत्मचिंतन में रुचि। काम, क्रोध, लोभ जैसे विकारों से ग्रस्त व्यक्ति इस मार्ग पर नहीं चल सकता।
जो इन गुणों से युक्त है, वह ज्ञान को आत्मसात कर शीघ्र ही परम शांति—अर्थात आत्मसाक्षात्कार—को प्राप्त करता है।
🕊️ शरणागति कैसे हो?
शरणागति का अर्थ है — अपने समस्त कर्मों को ईश्वर को समर्पित करते हुए, निरंतर उनके नाम का ध्यान और जप करना, और जीवन को संयम, ब्रह्मचर्य तथा निष्कामता से जीना।
आप प्रभु के दिव्य नाम "ॐ आनन्दमय ॐ शान्तिमय" का निरंतर, ध्यानपूर्वक जप करें — प्रातः से रात्रि तक, अपने सभी सत्कर्मों के साथ।
यही मानव जीवन का परम उद्देश्य है — इसी जन्म में दिव्यता को प्राप्त करें, यह अमूल्य अवसर न गँवाएँ। 🌺
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Very good post
Thank you for reading the blog 😃
Nice to see people read and comment too 👌🏽
Dear Sister I have a gift of God for your supreme welfare, I guess you can read Hindi but if not then please do get it translated into English through Google:
क्या आप जानते हैं जितेन्द्रिय, नियमित, निरंतर जप-ध्यान करने वाला श्रद्धावान भक्त ही दिव्य ज्ञान प्राप्त करता है, कामी-क्रोधी-लोभी नहीं ?
श्लोक संख्या: श्रीमद्भगवद्गीता 4/39
🔸 हिन्दी में श्लोक सहित सारांश:
"श्रद्धावान् लभते ज्ञानं, तत्परः संयतेन्द्रियः। ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥"
जो श्रद्धावान है, इन्द्रियों को वश में रखता है, और साधना में तत्पर रहता है—वही दिव्य ज्ञान प्राप्त करता है। ऐसा ज्ञानी शीघ्र ही परम शांति को प्राप्त होता है।
व्याख्या:
इस श्लोक में भगवान स्पष्ट करते हैं कि केवल बाहरी पूजा या ज्ञान की चर्चा से आत्मबोध नहीं होता।
ज्ञान प्राप्ति के लिए तीन गुण अनिवार्य हैं:
- श्रद्धा: गुरु, शास्त्र और ईश्वर में अडिग विश्वास।
- संयम: इन्द्रियों पर नियंत्रण, ताकि मन विषयों में न भटके।
- तत्परता: निरंतर अभ्यास, जप, ध्यान और आत्मचिंतन में रुचि। काम, क्रोध, लोभ जैसे विकारों से ग्रस्त व्यक्ति इस मार्ग पर नहीं चल सकता।
जो इन गुणों से युक्त है, वह ज्ञान को आत्मसात कर शीघ्र ही परम शांति—अर्थात आत्मसाक्षात्कार—को प्राप्त करता है।
🕊️ शरणागति कैसे हो?
शरणागति का अर्थ है — अपने समस्त कर्मों को ईश्वर को समर्पित करते हुए, निरंतर उनके नाम का ध्यान और जप करना, और जीवन को संयम, ब्रह्मचर्य तथा निष्कामता से जीना।
आप प्रभु के दिव्य नाम "ॐ आनन्दमय ॐ शान्तिमय" का निरंतर, ध्यानपूर्वक जप करें — प्रातः से रात्रि तक, अपने सभी सत्कर्मों के साथ।
यही मानव जीवन का परम उद्देश्य है — इसी जन्म में दिव्यता को प्राप्त करें, यह अमूल्य अवसर न गँवाएँ। 🌺